दिनेश ध्यानी
अपना-अपना दर्द
हैलो!हां.कैसे हो?ठीक हूँ, अपना सुनाओ कैसी हो?मैं ठीक हूँ। तुम सुनाओं?बस चल रहा है।बस चल रहा है? ये सुबह सुबह मुंह लटकाये क्यों हो? कुछ नही, बस ऐसे ही।तुम भी ना कुछ कहो तो मुंह लटकाकर बात करते हो और पूछो तो कहते हो कि कुछ नही। कहा ना कुछ भी नही।ठीक है तुम जानो और तुम्हारा काम जाने मैं क्यों परेशान होने लगी तुम्हारी उदासी देखकर।अरे बाबा मैं उदास नही हूँ, बस यू ही जरा आज सुबह मूड़ खराब हो गया था।क्यों कुछ कहा किसी ने?नही किसी ने कुछ नही कहा।मत बताओं, मैं जानती हूँ तुम्हारा वही पुराना राग। उसके साथ अभी तक बनाकर नही चले, उसे समझा नही पाये और अपने आप फुकते रहते हो। सच कहूँ कभी-कभी मुझे लगता है कि तुम शायद सनकी इंसान हो। जानते हो क्यों? क्यों कि तुम अपनी परेशानी को किसी को बताना नही चाहते हो और अपने आपस में बैठकर कभी भी तुमने उससे सुलह की कोशिश की नही फिर कैसे होगा तुम्हारी समस्या का समाधान?जानती हो दुनियां में कई ऐसी समस्यायें हैं जिनका अभी तक भी कोई समाधान नही निकला है। कई ऐसी बीमारियां हैं कि उनका इलाज नही खोजा जा सका है। इसमें अगर मेरी समस्या भी एक शामिल कर ली जाए तो फिर अचरच नही होना चाहिए। तुम कोई फैसला क्यों नही ले लेते?कैसा फैसला?अरे कि तुम्हें क्या करना है? कैसे रहना है? ऐसे में तो तुम्हारा जीना मुहाल लगता है।जानती हो जब मुझे फैसला लेना था तब मेरे अपनों ने मुझे फैसला लेने नही दिया और आज मैं चाहकर भी कुछ फैसला नही कर सकता हूँ। कैसी बिड़ंबना है जब फैसला लेने के हक में था तब अपनों की बंदिशें और आज किसी की बंदिशें नही हैं तो अब फैसला नही ले सकता हूँ। वाह! री जिन्दगी तेरे रंग भी अजब-गजब हैं। छोड़ो मेरी तुम अपनी सुनाओं, काफी दिनों बाद मिलना हो रहा है। कैसी हो?मिलना? मिलना हो रहा है कि फोन पर बातें हो रही हैं? सब ठीक चल रहा है। घर में सब ठीक हैं? हां फिलहाल सब ठीक हैं।अरे तुम्हारे उसका क्या हुआ, वो जिस प्रोजेक्ट पर तुम बात कर रही थीं ना।हां उसकी बात हो चुकी है मैंने प्रोजेक्ट सम्मिट कर दिया है। शायद अगले सप्ताह देहरादून जाना होगा।वेरी गुड़।थेंक्स। अच्छा एक बात कहूँ?हॉं कहां।तुम ऐसा क्यों नही कर लेते हो कि एक दिन उससे सीधी बात करों कि अब ऐसा कब तक चलेगा? अरे छोड़ो भी उन बातों को। जिन बातों का कोई हल नही हो सकता है, जो बातें हमारे बस से बाहर हो चुकी हैं उनको कुरेदकर क्या फायदा? जानती हो मैंने क्या क्या नही किया लेकिन हारकर अब मन को मना पाया हूँ कि दुनियां में कुछ चीजें ऐसी होती हैं कि उन्हें हम बदल नही सकते हैं। अब तो एक ही बहाना है कि किसी तरह से बच्चों का बुरा न हो। सच कहूँ तो बच्चों के भविष्य और उनकी सलामती के लिए एक छत के नीचे रह रहे हैं। हूं। लेकिन क्या तुम्हें नही लगता कि इस तरह अजनबियों की तरह रहना ठीक होगा?अजनबियों की तरह? इसमें बुरा क्या है? लोग भी तो एक ही बस में, एक ही रेल में घंटों तक अजनबियों की तरह यात्रा करते हैं। मैं तो इसे इतना ही समझता हूँ कि रात को सोने के लिए घर आ जाता हूँ खाना मिल जाता है कपड़े धुले मिल जाते हैं और क्या करना है?अरे बस यही चाहिए?और?और भावनायें और इमोसन्स का क्या?सच कहना, आज के जमाने में कोई किसी की भावनाओं और इमोसन्स की परवाह करता है?अरे मैं औरों की बात नही कर रही हूँ। जब हम एक ही परिवार में रहते हैं तो फिर पति-पत्नी के बीच भावनात्मक संबंध तो होने ही चाहिए नांभावनात्मक संबंध? अरे जब रिश्ता ही भावनाओं को दबाकर हुआ हो तो उसमें भावनात्मक संबध और इमोशन्स कहां से रहेंगे?तो उस समय विरोध क्यों नही किया तुमने?विरोध? सब कसाई की तरह खेड़े थे नाते रिश्तेदार। सबके सब इस तरह कर रहे थे कि जैसे इसके बराबर लड़की पूरे ब्रह्माण्ड में न हो या मुझे इसके अलाव कोई लड़की मिलने वाली नही है। वास्ता दिया गया था तब परिवार, नाते रिश्तों और खून का। तब मैं असहाय था और हां कहने के सिवाय कुछ नही कर पाया था। तो अब क्यों रोते रहते हो?रो नही रहा हूँ।इसे रोना ही कहते हैं। सुनों अब भलाई इसी में है कि चुपचाप अपनी गृहस्थी में जमे रहो और किसी प्रकार का दंश मत पालों। यह किसी के लिए भी उचित नही है। जितना हो सके जीवन को आराम और आनन्द से जियो।हां तुम कह तो सही रही हो। कहोगी भी क्यों नही समाजशास्त्र की प्रवक्ता हो ना, तुम प्रैक्टीकल से अधिक थ्योरी पर जोर देती हो।मैं तुम्हें पढ़ा नही रही हूँ।मैं तो कह रही थी कि हो सके तो सुलह करलो।सुलह? क्या मैंने कोई कारिगिल छेड़ा है? या शिमला समझौंते का उलंघन किया है? इतने साल से मैं सुलह के अलाव क्र ही क्या रहा हूँ? तुम सोचती हो कि मैंने अपनी तरफ से किसी तरह की कमी रखी होगी? नही ऐसा नही है मैंने हर वो प्रयास किया है जो कोई नही करता है। जानती हो मैंने हर तरह से समझौता किया लेकिन जानती हो न कि जिसने नही सुधरना है उसके लिए तुम अपनी जान भी दे दो ना तो कम ही है। इसलिए अब इसे अपनी नियति मानकर चल रहा हूँ। हॉं एक तुम हो जिससे मैं अपना दर्द बता देता हूँ, नही तो आज के जमाने में दूसरों के दर्द सुनने और समझने की फुरसत किसे हैं? अब जीवन में दर्द के सिवाय रह ही क्या गया है? तुम कैसे इंसान हो इतनी बातें की दर्द से शुरू की और फिर दर्द पर आकल अटक गये?क्या करूं? दर्द ही है जो अब मेरे जीवन का संगी साथी हैं। जानती हो ये दर्द ही है जो अपना फर्ज सिद्दत के साथ निभाता है और कभी भी दगा नही करता है। इसके अलाव आदमी का क्या भरोसा कब धोखा दे जाए। आज तो अपना साया ही जब साथ नही देता तो दूसरों से क्या कामना की जा सकती है।कभी कभी तुम बहुत ही दार्शनिक बातें करते हो और कभी-कभी छोट बच्चों की तरह उदास हो जाते हो ऐसा क्यों?मुझे खुद पता होता तो फिर बात ही क्या थी लेकिन मैं तो इतना जानता हूँ कि जब दर्द उठता है तो एक तड़प उठती है जो मुझे अन्दर तक हिला देती है और जब अपने दर्द को थोड़ा राहत देता हूँ तो लगता है कि आराम है। बस यही दर्द है जो कम ज्यादा होता रहता है लेकिन सदा ही मेरे साथ बना रहता है। जानती हो दुनियां में सब का अपना अपना दर्द होता है। किसी का कुछ न मिलने का दर्द, किसी का कुछ होने के बाद भी दर्द और किसी का दर्द न होने का दर्द। लेकिन मैं मानता हूँ कि दर्द हर किसी को है। कुछ सहा जाता है कुछ नही सहा जाता है। लेकिन यही दर्द है जो हमारे साथ है हमेशा से ही हमेशा के लिए।
हां तुमसे कौन जीत पाया है। दर्द तो है लेकिन अलग-अलग।
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Thursday, February 18, 2010
Monday, December 14, 2009
आज के दौर में मीड़िया की भूमिकादिनेश ध्यानी- 8/12/09भारत एक लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र के चार स्तभों मंे से एक स्तंभ है मीड़िया यानि कि प्रेस। वर्तमान में जहां नई-नई तकनीक एवं मशीनों के उपयोग ने समूचे विश्व को एक गांव के रूप में तब्दील कर दिया है, वहीं मीड़िया के प्रति आम जनमन को संवेदनशील बना दिया है। आज से लगभग बीस साल पहले भारत के अधिसंख्य गांवों में न तो अखबार जाते थे, न टेलीविजन, न फोन आदि संचार के माध्यमों की प्रचुरता ही थी, लेकिन हाल ही के वर्षों में औसत भारतीय के जीवन में यदि कुछ और सकारात्मक परिवर्तन भले ही न आया हो लेकिन संचार माध्यमों ने उसके इर्दगिर्द एक मकड़जाल बना दिया है। यही कारण है कि गरीब से गरीब आदमी भी एक टेलीविजन और मोबाईल फोन साथ रखता है। आज टेलीविजन, अखबार, मोबाईल, फोन आदि संचार माध्यमों के उपयोग से सुदूर गांवो में भी लोग देशकाल की घटनाओं एवं परिपेक्ष्य से अपड़ेट रहते हैं। कहना न होगा जब लोगों में संचार माध्यमों से चेतना का सृजन हो रहा हो तो ऐसे संक्रमण काल में मीड़िया की भूमिका और बढ़ जाती है। लेकिन हाल ही के वर्षों में मीड़िया न सिर्फ अपने दायित्वों से भटका है बल्कि उसके चारित्रिक गुणों का इस हद तक क्षरण हो गया है कि कभी कभी तो ड़र सा लगने लगता है कि जो खबर हम समाचार पत्र में पढ़ रहे हैं या टेलीविजन में देख रहे हैं कहीं यह प्रालंटेड़ न हो। दिल्ली विधानसभा के पिछले साल सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में टीबी चैनलों एवं अखबारों के दलाल प्रत्याक्षियों के चक्कर लगाते हुए घूम रहे थे। बात हो रही थी कि अगर आपको किसी बड़े अखबार में अपनी न्यूज लगानी है और लगातार तीन दिन तक तीन न्यूज लगनी है तो आपको प्रतिदिन के दस हजार रूपये देने होंगे जिसमें आपको 1000 अखबार की प्रतियां मुफ्त दी जायेंगी। वहीं टीवी चैनल पर एक बार में तीन से लेकर पांच मिनट के इन्टरव्यू के लिए जो कि दिन में तीन बार दिखाया जायेगा उसके लिए तीस हजार से लेकर पचास हजार तक देना होगा। आप दाम चुकाईये और आप जो कहंेगे वह खबर छप जायेगी। आप जो कहना चाहेंगे चैनल वही दिखायेगा। हो सकता है इस ठेकेदारी से कुछ अच्छे चैनल अलग हों या कुछेक अखबार अलग हों लेकिन कमोवेश हालात यही हैं। असल में पेशेगत प्रतिबद्धता समाप्त सी हो गई है। आज हर कोई अखबार और चैनल चलाकर लाभ कमाना चाहता है। बहुत कम हैं जो सिद्वान्त के लिए पत्रकारिता या चैनल चला रहे हैं। पत्रकारिता में एक शब्द था खोजी पत्रकारिता। जिसका अब लगभग लोप सा हो गया है। पहले संवादाता अपनी जान जोखिम में ड़ालकर अन्दर की खबरें लाता था। अखबार में छपी खबरों से सत्ता की चूलें तक हिल जाती थी। सरकारें अखबारों से ड़रती थीं। लेकिन हाल के वर्षों में मीड़िया और सत्ता की नजदीकी इस कदर बढ गई है कि अधिसंख्य नेता अखबारों के मालिकान हो गये हैं, चैनलों के मालिक खुद बन गये हैं। इस तरह के अखबारों या चैनलों से आप कि तरह नीति और निष्पक्षता की अपेक्षा रख सकते हैं? यही कारण है कि हाल के वर्षों में मीड़िया ने अपना वजूद खोया है। आज देश के पैसे पर, शासन और सत्ता पर, मीड़िया एवं संचार माध्यमों पर मात्र दो प्रतिशत लोगों का कब्जा है। वे जो दिखाना चाहते हैं हमे वही देखना होगा, वे जो सुनाना चाहते हैं हमें वही सुनना होगा, वे जो सिखलाना चाहते हैं हमें वही सीखना होगा। इसका सीधा असर सामाजिक तानेबाने पर पड़ रहा है और हाल ही के वर्षों में अपराधों की जो बाढ़ आई है उसकी बढ़ोतरी में मीड़िया भी कम दोषी नही है। आज के दौर में जो समाचार और विशेष के नाम पर जो टैर्र दिखाया जा रहा है, सीरियलों के नाम पर जो अश्लीलता और अनैतिक संबधों का बखान किया जा रहा है लगता है यही आदर्श और संस्कार रह गये हैं। आज की पीढ़ी का बताया जाता है कि भारतीय आदर्श एवं सोच पिछड़ी है। तुम्हें अगर अगड़ा बनना है तो वदन पर कम कपड़े होने चाहिए, हिन्दी एवं अपनी क्षेत्रीय बोलियों एवं भाषा के स्थान पर लच्छेदार अंगे्रजी आनी चाहिए। यही कारण है कि आज नगरों या गावों में भारतीय परिधानों का लोप सा हो गया है। संस्कारों का तिलांजलि देते हुए चोली एवं कुर्ता पैजामा, साड़ी की जगह टाप और जीन्स ने ले ली है। हम यह नही कहते हैं कि यह गलत है लेकिन मर्यादित तो पहनावा होना ही चाहिए।अधिसंख्य पत्रकारों एवं मीड़िया वालों को इस बात का इल्म नही है कि उड़ीसा के कालाहांड़ी में भूख से बेहाल लोग अपने बच्चों को बीस रूपये के लिए बेच क्यो देते हैं? क्यों भारतीय किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। लेकिन उन्हें दिनरात इस बात की फिकर अधिक सताती है कि फलां स्टार की होने वाली बहू कौन सा सूट पहनेगी? कैसे छींकेगी? कैसे उसके बाल सैट होंगे और उसकी चप्पल कौन मोची बना रहा है। कहने का मतलब बेहूदा और बेकार की बातों को तो मिर्च मसाला लगाकर पेश करना अधिसंख्य चैनलों की दिनचर्या बन गई है। कहने का मतलब यह है कि मानवीय संवेदनाओं एवं सामाजिक जागरूकता एवं सत्य का दिखाने समझाने का जो दायित्व मीड़िया का होना चाहिए था उससे बिमुख होने से देश और समाज का अहित ही अधिक होता है।पत्रकारिता एवं चैनलों में पारंगत अनुभवी लोगों की दखल भी हाल के वर्षों में कम होती नजर आ रही है। उक्त संस्थानों के मालिकान अपने लोगों एवं चाटुकारों के दम पर अपना व्यवसाय तो चला सकते हैं लेकिन जिस क्षेत्र में वे कार्य कर रहे हैं उससे उस क्षेत्र विशेष की मान्यतायें एवं मूल्यों का क्षरण तो होगा ही, जिसका खामियाजा उस पेशे के साथ-साथ देश व समाज को उठाना पड़ता है लेकिन प्रतिबद्वता एवं जिम्मेदारी तय न होने के कारण कई लोग अपने लाभ के लिए इस तरह के हथकण्ड़े अपनाते है। जो कि आज अधिक प्रचुरता से देखने में आ रहा है।त्वरित लाभ एवं सस्ती लोकप्रियता के मोह से बाहर निकलकर यदि मीड़िया आज के दौर में अगर अपनी भूमिका के प्रति संवेदनशीलता दिखाता है तो उससे समाज एवं देश का लाभ होगा। समाज में जागरूकता आयेगी एवं भारतीयता व भारतीय संस्कृति, सभ्यता का प्रचार प्रसार होगा। लेकिन चन्द लाभ के लिए अगर मीड़िया अपनी भूमिका से मुहं मोड़ता है तो उसका समाज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आज के दौर में कुछेक अखबार या चैनल ही हैं जो अपनी भूमिका सही निभा रहे हैं अन्यथा अधिसंख्य मात्र अपने लाभ के लिए मूल सिद्वान्तों के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। इसलिए सरकार को इस दिशा में मीड़िया के लिए कुछ मूलभूत दिशा निर्देश जारी करने चाहिए। जिम्मेदारी तय करनी चाहिए एवं जो अखबार या चैनल अपने मूलभूत सिद्वान्तों से बिमुख होता है उसकी पात्रता निरस्त करे जाने की व्यवस्था होनी चाहिए। और यह तभी होगा जब स्वयं राजनीति एवं सरकारंे अपने दायित्वों का सही निर्वहन करेंगी एवं अपने दायरे में रहकर सीमाओं व व्यवसायगत मान्यताओं का अतिक्रमण नहीं करेंगी। इससे देश और समाज को सही जानने एवं सही दिशा में विकास किये जाने का अवसर ता मिलेगा ही सही सोच और संस्कारों में भी सहयोग होगा। आशा की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में मीड़िया अपने महत्व एवं दायित्वों को समझते हुए पेशेगत कमियों को दूर करते हुए अपनी तेज धार एवं मूल्यों पर खरा उतरेगा।
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