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Monday, September 2, 2013

मेरे जाने के बाद

मेरे जाने के बाद
बहुत कम लोग
शोक मानायेंगे
चन्द लोगांे के हिय
कसमसायेंगे
गिने चुने लोगों की
आंखों में अश्रु आयेंगे
मेेरे जाने के बाद।

सगे, संबधी, अपने, पराये
मित्र, सखा, लोग-बाग
कुछ ऐसे भी होंगे
जो कहेंगे, अच्छा हुआ
निपट गया।
बहुत बनता था
हर किसी की बात पर
उंगल करता था
सिद्धान्तवादी बनता था
सामने ही सामने
बात कहने की हिमाकत करता था
वे लोग कांटा निकलने का
सुकून पायेंगे
मेरे जाने के बाद।

शोक सभा......!! शायद
हो.... भी न भी हो
उसमें आये कुछ लोग
मेरे बीते पल दुहरायेंगे
अच्छी बातें कहकर
माहौल बनायेंगे
बातों ही बातों में मेरी
तारीफ के पुल बांधेंगे
मेरे जाने के बाद।

आकलन होगा?
शायद हो, न भी हो
बस चन्द दिनांे मेंे
सब भूल जायेंगे
मेरी कविता, कहानियों की किताबें
किसी कोने में धूल खायेंगी
अनकही कथा, कहानियां
बात कहने को कसमसायेंगी
मेरे जाने के बाद।

इन सबसे अलग, सबसे अहम
एक हिय ऐसा होगा
जिसे मेरे न होने का
विश्वास ही नही होगा
वो मन ही मन
न रो सकेगा 
न हंस पायेगा
मेरे जाने के बाद।

उसके होंठ मेरे गीत
गुनगुनायेंगे
सुनहरे बीते पल उसकी 
आंखों में तैर आयेंगे
मेरी कविता, कहानी उसे
मेरी याद दिलायेंगी
बीते पलों का इतिहास बतायेंगी
हर लम्हा उसे मेरी याद आयेगी
मेरे जाने के बाद।
दिनेश ध्यानी
02, सितम्बर, 2013.

Sunday, August 11, 2013






हे निरसु निरदै विधाता मिन नि जाणी
घर बौडू नि होणू हमरू यनु नि जाणीं।

सौ सला, कौ करार कैकी  गै त छां हम जातरा म
यखी जुगा ह~वै जाण हमुन यनु नि जाणीं। हे निरसु....

बाबा केदारा का थान मौत यनु तांडव मचाणी
आखरी जातरा च हमरि यन्नु नि जाणीं। हे निरसु....

मौ कि मत ह~वै गैंन घडी मा जिन्दग्यों कु अन्त यख
समळणा कु मौक बि नि मिलणू, यनु नि जाणी। हे निरसु....


आस अर वि”वास अपणू, मन म  रैंगेन स्याणी गांणी
इनु बिजोग प्वडण हमु खुणि यन्नु नि जाणीं। हे निरसु...
             


Wednesday, August 7, 2013

जीवन का हर रंग तुम्ही से
सब भावों का संग तुम्ही से
तुम से सुख कि धरा सजी है
अवनि मेरी पहचान तुम्ही से...ध्यानी. ८/८/१३.

Tuesday, July 9, 2013

इंतजार


दिनेश ध्यानी
2.

अजीब बात है ना जब इंसान के दिन अच्छे होते हैं तो वह बुरे समय की कल्पना भी नही करता और जब उसका बुरा समय आता है तो वह अच्छे दिनों की याद कर फिर से उन दिनों को उन पलों को पाने के लिए तड़प जाता है। और यह तड़प उसे बचैन करती रहती है। बीता पल और उसकी यादें इंसान को सदैव कचोटती रहती हैं। शायद ही माया मोह है।
आकाश बाबू भी तो इंसान ही हैं, वै भला जीवन की उदासी, आशा, अभिलाषा से कैसे दूर रह सकते हैं। यदाकदा जो भी घटता उसका असर उनके मन, चित्त और भाव विचारों पर पडता ही है।
आकाश बाबू को याद है कि+  आज पूरे अस्सी दिन होने को हैं तब से उनकी बात अपनी जीवनसंगिनी से नही हो पाई है। आकाश बाबू ने तो हर तरह से कोशिश की लेकिन उनकी जीवनसंगिनी ने न तो उनकी बात का उत्तर दिया न फोन उठाया और न कुछ कहा। आखरी अल्फाज आज भी आकाश बाबू के कानों में गूंजते रहते हैं जब उनकी जीवन संगिनी ने यह कहकर कि अभी मेरे पास बहुत काम है सब्जी चढानी है और खाना बनाना है, बस इतना कहने के बाद फोन काट दिया और लाख कोशिश करने के बाद भी आज तक आकाश बाबू का फोन रिसीब नहीं किया।
असल में जो आकाश बाबू को लगता है कि उनकी जीवनसंगिनी क्यों उनसे खफा हो गई इसका कारण शायद यह हो सकता है कि उनकी जीवन संगिनी को लगता हो कि आकाश बाबू किसी अन्य के साथ अपने विचार और चीजें शेयर क्यों करते हैं वो भी फेसबुक पर। लेकिन आकाश बाबू ने कभी भी इन बातों को इतना महत्व नही दिया। आज के युग में जो हमारे पास है हमारा अपना है वह अपना है। और बाहरी दुनियां में या यों कहें कि साधनों की भीड़ में जरा सी असवाधानी से इस प्रकार की श्ंाका और संशय उपजना आज की पीढी और किसी न किसी रूप में व्यवस्था की रवायत का भी असर है। लेकिन फिर भी संबधों और अपनत्व की नींव, बेल इतनी कमजोर क्योंकर हो जाती है कि जीवन मरण का संबध और कमसें ,रसमें और समर्पण सब जरा सी बात पर खतरे की जद में आ जाते हैं?
पहले पहल तो आकाश बाबू ने सोचा शायद थोड़ा बहुत गुस्सा होंगी लेकिन जैसे-जैसे दिन बढते गये आकाश बाबू को दिल उसी तरह बचैनी और अनिष्ठ की आशंका से भयभीत रहने लगा। पहले तो रातों की नींद और खाना खराब हो रखा था लेकिन अब ताक उनका अन्तस और मन इतनी वेदना में है कि क्या कहें। लेकिन आकाश बाबू को आज भी उम्मीद है कि उनकी जीवनसंगिनी ऐसी कभी नही हो सकती कि उनसे बात ही न करे।
आज आकाश बाबू को सबसे अधिक जो बात परेशान कर रही है वह यह कि उनकी संगिनी किस बात से खफा हैं इसका पता भी नही उनको। जो वे कयास लगा रहे हैं उनसे ऐसा आभास नही होता कि कोई भी इंसान जीवनभर का रिश्ता और जन्म जन्मांतर का संबध यों ही एक ही झटके से तोड़ देता हो जैसे उत्तराखण्ड में आई तबाही ने नदियों पर बने पुलों को ओर छोर से तहसनहस कर दिया।
कोई कुछ भी कहे लेकिन जीवन में बहुत कम अवसर और बहुत कम इंसान ऐसे होते हैं जो आपके जीवन पर अमिट छाप छोड देते हैं। यही बात आकाश बाबू के साथ थी उनके जीवन में जब से उनकी जीवन संगिनी आईं थी तब से उनका जीवन, जीवन की परिभाषा और दिशा दशा ही बदल गई थी। उनको हर विपदा और परेशानी में सदा ही उनकी जीवनसंगिनी ने ढाल बनकर तारा, जो भी मौका आया हो हरदम उनका हमसाया बनकर खडी रही। अपनी भूख, प्यास और अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था। आकाश बाबू का नाम हो उनका अच्छा काम हो इस बारे में उनकी जीवनसंगिनी सदा ही कोशिश और उनको मार्गदर्शन करती रहती थीं। हर पल और पल-पल में जीवन में जो भी घटित हो रहा हो दोनों शेयर करते और उसपर आगे का मार्ग प्रशस्त करने हेतु विचार करते थे। दोनों को एक दूजे पर खुद से अधिक विश्वास और आत्मीयता थी, दोनों एक दूसरे पर जान छिडकत थे लेकिन आकाश बाबू परऐसा क्या हो गया कि आकाश बाबू से उनकी जीवनसंगिनीरूपी उनका जीवन ही छिन गया?
जीवन में कुछ ऐसा होता रहता है कि आपस में विचार न मिलें। कभी कभी हमें एक दूसरे पर संशय और विश्वास भी डिगने लगता है लेकिन असल में हमारे एक दूसरे के प्रति जो भाव हैं, जो विचार और संबध की जो नींव है वह इतनी कमजोर क्यों हो जाती है कि जरा सी बात पर जीवन ही बदल जाता है? अपनी जीवनसंगिनी को आकाश बाबू हरदम अपने दिल में बसाते हैं और उनका रास्ता आज भी तन्मयता से देख रहे हैं, उन्हें उम्मीद है कि जरूर उनकी जीवनसंगिनी लौटेगी और तब फिर से उनके जीवन मे बहार आ जायेंगी।
आकाश बाबू की जीवनसंगिनी जैसा कि आकाश बाबू का कहना है दुनियां की अकेली ऐसी महिला है जो दूसरों के दुख को देखकर भी अपनी आंखें गीली कर देती हैं लेकिन उनके मन में आकाश बाबू के प्रति इस प्रकार की विरक्ति कैसे उपज गई कि तीन महीने होने को आये लेकिन पलटकर खबर तक नही ली? आखिर ऐसा क्या हो गया कि उन्हौंने जरा सी भी सुध नही ली। आकाश बाबू से जब इस बारे में पूछा तो वे बोले।
भाई हम तो आज भी अपनी जीवनसंगिनी के ही प्रताप से और उनकी प्रेरणा से चल रहे हैं। जीवन का कोई भी पल ऐसा नही गुजरा जिसमें हमारी जीवनसंगिनी हमारे अन्तस में रचीबसी न रही हों। असल बात तो यह है कि हमारी जीवनसंगिनी हमारे अन्तस में गंगा के समान हमेशा हमारी धमनियों में बहती रहती हैं और हमारे चित्त को हमेशा जगाती रहती हैं। सचकहूं तो हमारी जीवन संगिनी सदैव हमारे साथ हमारे पास रहती हैं। पूजा में वे मेरी आरजू हैं, तपस्या में मेरी शक्ति हैं और जीवन के संघर्ष में मेरी प्रेरणा और ताकत हैं। हां जरा उनके दूरे होने का रंज तो है, मन खराब और जीवन ऐसे लग रहा है जैसे सिर्फ जीवन चल रहा है जी नही रहा हूं लेकिन फिर भी उम्मीद है कि मेरा जीवन वापस लौटेगा, मुझे हर पल अपनी जीवनसंगिनी को इंतजार रहता है। सुबह दिन होने का दिन में शाम होने का और शाम को रात होने का कि कभी न कभी मेरी जीवन संगिनी का संदेशा आयेगा, कीाी न कभी मेरे फोन पर उनकी काWल आयेगी, और जब रात गहरा जाती है तो मन उस स्याह रात से अधिक उदास और व्याकुल हो जाता है और सच मानों को सोता भी उन्हीं के ख्वाबों के साथ हूं और जागता भी उनकी यादों और उनकी खैरियत के साथ ही हंू। पूजा करते हुए उनकी सलामती की दुवा करता हूं और संकट में उनकी बातों, सहारे और उनके आत्मबल के भरोसे हर संकट और परस्थिति से उबरने के कोशिश करता हूं। बाकी बाबा विश्वनाथ जी पर पूरा भरोसा है कि मेरे जीवनसंगिनी के लौट आने से फिर से मेरे जीवन में बहार आयेगी। इसी उम्मीद से जीवन कट रहा है। कहते हुए आकाश बाबू के आंखों में उतर आयें आंसूं सबकुछ बयां कर गये।





Monday, June 17, 2013

उत्तराखण्ड में बाढ़, भूस्खलन और तबाही का मंजर
कहीं जानकर अनजान बने रहने की सज़ा तो नहीं ये..



दिनेश ध्यानी.
इस देश में जितने भी अपराध हो रहे हैं उनमें से अधिकाशं के मूल में या यूँ कहें की  ९५ प्रतिशत अपराधों  के पीछे किसी न किसी तरह शराब की भागीदारी होती है. लेकिन जागरूक जनता  और सरकारें कभी भी इस और ध्यान इंगित नहीं करती, कारण लोगों में ९५ प्रतिशत से अधिक लोग शराब का सेवन करते  हैं और सरकारों को सर्बाधिक रेवेन्यू (पैसा) इसी शराब से मिलता है. इसलिए कोई भी इस बुराई को बंद करने की बात नहीं करता.
वहीं उत्तराखण्ड में हो रही तबाही पर आंसू तो सभी बहा रहे हैं लेकिन सच का सामना करने की हिम्मत किसी की नहीं. यहाँ टिहरी बाँध सहित नदियों पर बन रहे सैकड़ों बाधों के कारण यहाँ मौसम में बदलाव तेजी से आ रहा है, पहाड़ कमजोर पर रहे हैं और जगह-जगह बाँध बनने से गर्मियों में बहुत तेजी से वाष्पीकरण होने के कारण बादल बहुत अधिक पानी सोख रहे हैं जिस कारण वे बहुत भरी हो रहे हैं, इतनी भारी बादल कहाँ बरसेंगे? और उसी का नतीजा है उत्तराखण्ड सहित सम्पूर्ण हिमालय छेत्र में बादल फटना, भू स्खलन, और बाढ़ का ताण्डव हर साल विकराल से विकराल रूप में सामने आ रहा  है. बिकास के नाम पर अपनी पीठ थपथापने वाले नेता हों या पर्यावरण के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले अधिसंख्य लोग कोई भी इस और ध्यान नहीं देता, ना इस बारे में बात करते हैं.
उत्तराखण्ड के तथा कथित पर्यावरण विद भी अपनी अपनी डफली लेकर चल रहे हैं, कोई भी इस बारे में बात नहीं करता की टिहरी बाँध बनने के बाद हो हालत बने हैं उनसे कैसे निपटा जाए? नेता हवाई यात्रा करके बयान जारी करके अपना फर्ज पूरा समझते हैं, आलीशान घरों में रहने वाले, जनता पा पैसा फुकने वाले नेता क्या जाने बदल फटने, बाढ़ और भू स्खलन से क्या तबाही होती है... दूसरों के दर्द से अगर इन्हें कुछ लेने देना होता तो पिछले साल के हादसे से सबक लिया होता, लेकिन किसी ने भी कुछ सबक नहीं लिए और यही कारण है की इस साल शुरू में ही तबाही का मंजर खौफ़नाक रूप इख्तियार कर गया. जिसमे जान माल का बहुत नुकसान हुआ है.
      इस बरबादी का खामियाजा जनता भी ही भुगतना पड़ रहा है. जिनके घर बह गये, जिनके अपने पराये बह गये हैं उनसे पूछो क्या होता है तबाही का दर्द. अगर यही सोच और नजरिया रहा तो साल दर साल यही दुहराया जायेगा और जनता को यूँ ही खामियाजा भुगतना होगा....
     अभी समय सरकार उत्तराखण्ड के बारे में कुछ सटीक रणनीति बनाकर यहाँ हो रहे एक पक्षीय विकास की गाथा पर पुनर्विचार करे और विकास का विश्व रिकार्ड बनाने से पहले यहाँ की जनता के हितों और उनके जीवन के बारे में भी सोचे. अन्यथा आने वाले कल में क्या होगा इसका आकलन करना मुश्किल होगा... सरकार जन सरोकारों को अपनी जूठी तुष्टि और थोथे बिकास के नाम पर दर किनार नहीं कर सकती हैं... देश का सीमांत इलाका अगर हर साल इस प्रकार की  आपदा खामियाजा भुगतता रहेगा तो ये शुभ संकेत कदापि नहीं हैं.


Tuesday, June 11, 2013





















जरा सी भूल

दिनेश ध्यानी

इस शहर में कमरा मिलना कितना मुश्किल हो गया है। अब तो मकान मालिक एक कमरा किराये पर देने के लिए भी हजारों नखरे दिखाते हैं। असल में मकान मालिक भी क्या करें, जमाना ही इतना खराब हो गया है कि किसी को किसी पर विश्वास ही नही रहा।
राकेश को इस शहर में दो साल हो गये हैं। सरकारी विभाग में सेवारत हैं, लेकिन सरकारी मकान नही मिला। किरायेदार को कितनी परेशानियों का सामना करना पडता है, अगर देखना हो तो महीने की आखरी तारीख के करीब किसी प्राइवेट काWलोनियों की तंग गलियों मंे आकर देखो। सामान लादे टzक और रिक्शा कैसे घूमते रहते हैं। उनके पीछे बेहताशा परेशान किरायेदार, कोई हाथ में छोट, मोटा सामान लिये कोई बच्चों को गोदी में उठाये रिक्शे के पीछे तेज-तेज कदमों से दौडते हुए कमरा बदलने के लिए।
कमरे में सामान रखकर राकेश आलमारी खोली तो उसमें एक बडा सा लिफाफा रखा हुआ मिला। राकेश ने लिफाफे को खोला तो उसके अन्दर एक पत्र रखा हुआ था। पहले उसने सोचा कि रहने दे, क्या पता किसका पत्र है नही पढता, लेकिन फिर जिज्ञासावश उसने पत्र को पढना शुरू किया तो उसमें डूब सा गया । पत्र पढकर राकेश का मन भारी हो गया। उसे लगा कि उसने इस पत्र को पढकर कहीं कोई गलती तो नही की। क्या ऐसा भी होता है दुनियां में? लोग जरा-जरा सी बात में अलग हो जाते हैं। जरा सी बात में प्यार को कुर्वान करना और जीवन की दिशा और धारा बदल देते हैं? सोचकर ही राकेश पसीना-पसीना होया। पत्र का मजबून इस प्रकार से था।
मेरी प्यारी लाटी! कैसी हो तुम। आशा है तुम कुशल होंगी। लाटी अचानक ये क्या हो गया? हमारा इतने दिनों का संबध पल में ही छिटक गया। तुम्हें पता है कि जब तुम बात नही करती हो, तो फिर कैसा हो जाता हूं। जानता हूं मुझसे अधिक परेशान तुम भी होंगी। लाटी क्या मेरी जरा सी भूल के कारण सच में हमारा रिश्ता समाप्त हो जायेगा? कभी सोचा भी नही था कि तुम अचानक इतने दिनों तब बात ही नही करोगी।
तुम मेरा जीवन, मेरा संबल और मेरी आशा, अभिलाषा, और परिभाषा हो। तुम्हारे बिना तो मैं जीने की कल्पना भी नही कर सकता हूं। तुम मेरी आत्मा हो और आत्मा के बिना क्या शरीर का कोई अस्तित्व होता है? तुम्हें पाकर में पूर्णता को प्राप्त हो गया हूं। मुझे जीवन में अगर मेरी मां के बाद किसी ने प्रभावित किया है तो वो तुम हो मेरी लाटी। मां ने मुझे जन्म दिया और तुमने मुझे जीना सिखाया, जीवन संर्घष में कैसे धैर्य बनाये रखना है और सदा ही आगे बढने के लिए सदा ही प्रेरित किया है।
जानता हूं तुम क्यों नाराज हो। तुम्हारी नाराजगी अपनी जगह जायज है, लेकिन इस तरह चुप्पी साधने से अच्छा होता बात करतीं। जीवन में कभी-कभी अचानक कुछ ऐसा भी घटित हो जाता है, जिसकी कल्पना भी हम नही करते। और आपसी संबधों की धरा चरमराने लगती है, सामने वाले के प्रति हमारा अनुराग और विश्वास डिगने लगता है। जब कि हकीकत में असलियत कुछ और ही होती है। मैं खुद को पाकसाफ कदापि नही बताता क्यों कि आखिर मैं भी इंसान हूं लेकिन इतना जानता हूं कि जब से तुम मेरे जीवन में आई हो तब से किसी और के बारे में सोच भी नही सकता। तुम मेरे लिए क्या हो इसे शब्दों में परिभाषित करना मेरे बूते की बात नही है।
किसी और पोस्ट को फेस बुक में शेयर करके मैंने नाहक तुम्हारा दिल दुखाया, जब कि तुम भी जानती हो कि मेरा उससे कोई सरोकार नही है।यों समझ लो कि हमें परेशान करने का सबब था। लेकिन तुम्हें इससे से शक हुआ होगा, जो कि लाजमी है। लेकिन मैं कसम से कहता हूं कि ऐसा कुछ नही जिस कारण हमारा संबध बिगडे या अविश्वास का माहौलन बने। दूसरी बात अप्रैल को जोे आगzह था, उसने भी तुम्हें आहत किया होगा। इस हेतु क्षमा प्रार्थी हूं। अच्छा होता कि अगर आपको किसी भी प्रकार की शंका होती या परेशानी होती तो मुझसे शेयर करती। अच्छा होता कि हम बात करके सारे मामले को सुलटा लेते।
तुम्हें याद है मैने तुम्हें कहा था कि मेरा तुम्हारे आगे पूर्ण रूप से समर्पण है और मैं आंख बंद करके तुम पर खुद से अधिक विश्वास करता हूं। क्योंकि तुम मेरा संसार हो जीवन हो और सत्व हो। लाटी मुझे तुम्हारा साथ चाहिए और सिद~दत से चाहिए। तुम्हारे बिना मैं जीने की कल्पना भी नही कर सकता। तुम जो बोलोगी वही करूंगा और किसी प्रकार तुम्हारा मन नहीं दुखाउंगा।  मेरे मन में जीवन में और हर भाव में लाटी तुम ही थीं और जीवन पर्यन्त रहोगी, कामना है कि तुम बस मुझसे जुडी रहना। सुनो! अगर पुर्नजन्म होतो है तो मैं हमेशा भगवान से हुआ करूंगा कि मुझे हर जन्म में मेरी ही लाटी मिले।
पत्र में आगे लिखा था कि........
बीते दिनों की हर बात जब याद आती है तो अतंस को झकझोर देती है। किस प्रकार से हम तुम मिले और जन्म जन्मातर एक रहने की कसम खाई थी। वो दिन याद करो जब हम तुम पहली बार मिले थे। तुम्हें याद है ना हम दोनों को कुछ कदम साथ-साथ चलना और दो अजनबियों का दो जिस्म एक जान होने तक का सारा मंजर कितना सुखद और भावपूर्ण था। सच तुम्हें पाकर मैं धन्य हो गया। जब भी मुझे कोई कष्ट हुआ तो दर्द तुम्हारी आंखों में छलका और जब तुम उदास होती हो तो तडप मेरे दिल में उठती है। लाटी तुमने कैसे हर भंवर से मुझ उबारा क्या वो भुला सकता हूं? मेरे लिए तुमने जो कष्ट सहे हैं, जो परेशानियां उठाई हैं, उनको कैसे भुला सकता हूं? मैं हां नादान जरूर हूं लाटी,  लेकिन किसी प्रकार से अहसान फरामोश या दगाबाज नही हूं।
हमारा प्यार सतही नही है। ये दो आत्माओं का संगम और भावनओं की गंगा का मूर्तरूप है। तुमने ही तो कहा था उस दिन कि मैं जल्दबाज हूं कोई भी फैसला लेने से पहले सोचता नही हूं। सुनो एक बार फिर से मुझे उन्हीं संबोधनों से पुकारो ना मेरी लाटी। जब तुम हंसकर मुझे उक्त संबोधनों से बुलाती हो तो बहुत अच्छा लगता है। चिडचिडे, चिडंगे और बेचैन आत्मा कहो ना प्लीज।
मैं आज भी वहीं खडा हूं तुम्हारी बाट जोह रहा हूं और हर पल, हर घडी, हर भाव में और आती जाती सांसों मंे सिर्फ तुम्हारा नाम ही आता है। आज भी हर पल इंतजार रहता है कि तुम कभी न कभी तो अपनी चुप्पी तोडोगी। लेकिन कभी डर भी लगता है कि अगर तुमने ये चुप्पी न तोडी तो मेरा क्या होगा? लेकिन दूसरे पल अन्दर से एक अटूट विश्वास भी सहारा देता कि, नहीं मेरी लाटी ऐसा नही कर सकती। यही विश्वास मुझे सुबह से दिन, दिन से शाम, शाम से रात और फिर रात से नई सुबह की प्रतीक्षा करने का संबल देता, कि कभी न कभी मेरे प्यार की नई सुबह होगी और हमारा छोटा सा संसार फिर से गुलजार होगा।
सोचा मकान बदल दूं। यहां हर कोने में तुम्हारे साथ फोन पर की गइz बातों की यादें अब मुझे चैन से नही रहने दे रही हैं। बाWलकानी हो या कमरा या नीचे बागीचा कहीं भी मन नही लग रहा है। हर जगह तुमसे जुडी यादें हैं इसलिए असहनीय पीडा में जी रहा हूं। यह गलत है अपने दुख से भागना नही सामना करना चाहिए लेकिन लाटी जब दर्द भंयकर बढ जाऐ  तो उससे फौरी तौर पर राहत जरूरी है। मैं भगोडा नही हूं लेकिन सच लाटी तुम्हारी यादें इतना तडपारही हैं कि असह~य दर्द क्या होता है आज पता चला।
लाटी बहुत लिख दिया है। कम लिखा अधिक समझना और भूलचूक माफ करते हुए अपने लाटे से बात करना, मैं प्रतीक्षा में हूं कि तुम कब लौटोे। काश तुम अपना मौन तोडती और बात करती। लाटी अपना खयाल रखना तुम भी मेरी तरह अपने प्रति बहुत लापरवाह हो और जरा भी अपना खयाल नही रखती हो। पहले ही जीवन में अपनी लापरवाही करके बहुत कुछ खो चुकी हो और अब और लापरवाही ठीक नही। अपना खयाल रखना और लाटी याद रखना तुम ही मेरा जीवन हो, तुम्हारे अलावा किसी और के बारे में सोचना भी पाप है। तुम्हारा लाटा।
राकेश ने पूरा पत्र एक ही सांस में पढ दिया। इन दो प्रेमियों के वियोग और वेदना का दस्तावेज है यह पत्र। उस पागल प्रेमी ने अपनी प्रेमिका को लिखा होगा, लेकिन कमरा बदलने की जल्दबाजी में इसे यहीं छोड गया होगा। राकेश ने उस पत्र को संभाल कर रख दिया। उसने सोचा कि उन पागल प्रेमियों में से क्या पता कभी कोई अपना खत लेने आ जाए। राकेश की समझ में भी नही आ रहा था कि जरा सी गलती पर उस लडकी ने अपने प्रेमी से बात बंद क्यों कर दी होगी? ऐसा तो नही करना चाहिए था उसे। कम से कम बात तो करती, शिकवा शिकायत करती। गलती तो हर किसी से भी हो सकती है। लेकिन इसका मतलब यह तो कदापि नही कि तुम चुपमार कर बैठ जाओ। यह भी सच है कि प्यार जितना गहरा और पाक होगा उसमें एक दूसरे के हाव भावों पर एक दूसरे की पैनी नजर होगी। और एक दूसरे के प्रति समर्पण और न्यौछावर होने का जज्बा ही तो प्यार को आकार देता है। अच्छा यही होता है कि जब आपस में संदेह, शक या कोई शंका उत्पन्न हो जाए तो उसका समाधान वार्ता से होना चाहिए। एक पक्षीय फैसला अक्सर बाद में गलत साबित होते हैं लेकिन बाद में फिर उस गलती को सुधारने का मौका नही मिलता दूसरी बात अगर प्रेम सच्चा हो तो उसे कोई दूसरा कैसे चुरा सकता है? खुद पर और अपने प्रेम पर विश्वास होना चाहिए। जरा-जरा सी बातों पर संबध समाप्त करने की नादानी नही करनी चाहिए।
राकेश भी पत्र पढकर और उन दोनों के बारे में सोचकर भावुक हो गया। उसे पता ही नही चला कब नौ बज गये। उसने अभी सामान भी नही लगाया था और खाने पीने का भी कोई ठिकाना नही था। आज तो उसे होटल में ही खाना होगा। राकेश ने  पत्र उसी लिफाफे में रखते हुए कहा मन ही मन कहा हे भगवान कितना चाहता है वो अपनी प्रेमिका को काश ऐसा प्यार सभी को मिलता। इन दोनो प्रेमियों की सुलह करा दो ओर फिर से इनके पुराने दिन लौटा दो।
















प्रेम कि गूल में
नेह के फूल से
भावों का स्पन्दन
हौले से देती हो.
हर्षित मन
खिलता तन
नेह थाप पाकर
पुलकित है रोम-रोम
कैसा अवनि प्रेम है...दिनेश ध्यानी...११/६/१३