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Monday, August 6, 2012


पहाड़ में गांव




पहाड़ के गांव
देखकर लगता है
कैसे लोग रहे होंगे वे?
बेहद जिद~दी और
अपनी धुन के पक्के
तभी तो इन जिददी पहाड़ों में
आकर बसे होंगे वे।
उतुंग शिखरों पर
अगास की धार पर
जिसको जहां मिला
वहीं रच ड़ाला जीवन
बसा दी अपनी बस्ती।
वे लोग नही जानते थे
शायद कि जिन सूने 
पहाड़ों को वै आबाद कर हैं
उनकी पुस्तें एक दिन
इन्हें बंजर बना देगे
गर वे जानते तो शायद
इतनी सिददत से
इन पहाड़ों पर गांव, घर 
और इतने सुन्दर खेत खलिहान
न बनाते।
वे तो आजीवन रचते रहे
अपनों की खातिर लड़ते रहे
इन पहाड़ों से
वे सोचते होंगे कि 
हमारी पुस्तें भी इन पहाड़ों में
मंडुवा, झंगोरा, धान, मुगरी और
कखड़ी, मिर्च, करैला, और भट~ट
गहद उगाकर अपने जीवन में
आगे बढ़ते रहेंगे।
उन्हें क्या पता था कि ये
इतने आगे बढ़ जायेंगे कि
फिर इन पहाड़ों पर न चढ़ पायेंगे
इन्हें पहाड़ नही भायेंगे और
गर भायेंगे भी तो टेलीविजन में और
सैर सपाटे की खातिरभर।
आज उन पुरखों के बसाये घर गांव
वीरान होने लगे हैं और हम
विकास की गाथा लिख-लिखकर
अपने फ~लैट के कोने में, छत के टुकडे में
अपना घर, गांव और पहाड़ बसा रहे हैं।
काश हम दिल्ली, मुम्बई और देहरादून
अपने गावं में बसा पाते 
काश हम अपने गांवों का विकास कर पाते।।. ध्यानी. 16, जुलाई, 2012. सांय: 3-28. बजे।

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